Railways Solar Coach to Generate 13,400 Units of Power Annually
भारतीय रेलवे एक बार फिर ग्रीन एनर्जी की दिशा में एक नया और दिलचस्प कदम उठाते हुए नज़र आई है। इस बार कमाल किया है North Central Railway (NCR) ने, जिसने अपने एक कोच की छत पर सोलर पैनल लगाकर उसे पूरी तरह इको-फ्रेंडली बना दिया है। ट्रायल के तौर पर ये खास सोलर कोच दादरी एक्सप्रेस में लगाया जा चुका है, और शुरुआती नतीजे काफी उत्साहजनक बताए जा रहे हैं।
इस खास कोच की छत पर 6.93 किलोवाट पीक क्षमता वाला अत्याधुनिक सोलर सिस्टम इंस्टॉल किया गया है। इसका सीधा फायदा ये होगा कि कोच के अंदर लगे पंखे, लाइटें, और मोबाइल चार्जिंग पॉइंट्स को अब बिना किसी रुकावट के लगातार बिजली मिलती रहेगी — वो भी बिना डीज़ल जनरेटर पर निर्भर हुए।
अब बात करते हैं इसके पीछे के टेक्निकल प्रोसेस की। जब सोलर पैनलों पर सूरज की रोशनी पड़ती है, तो उससे बनने वाली बिजली सबसे पहले एक बैटरी बैंक में स्टोर होती है, और उसी स्टोर की गई बिजली से बाद में कोच के अंदर पंखे और लाइटें चलाई जाती हैं। North Central Railway के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. शिवम शर्मा ने बताया कि इस तरीके से पारंपरिक बिजली पर निर्भरता कम होती है और साथ ही हरित ऊर्जा यानी ग्रीन एनर्जी को भी बढ़ावा मिलता है।
अब सबसे दिलचस्प आंकड़ों की बात करते हैं। रेलवे के मुताबिक, इस सोलर सिस्टम से प्रति कोच हर साल करीब 13,400 यूनिट स्वच्छ बिजली का उत्पादन होगा। इससे रेलवे को एक ही कोच से सालाना लगभग 2.80 लाख रुपये के राजस्व की बचत होने का अनुमान है — और अगर ये सिस्टम आगे चलकर बड़े स्तर पर पूरे नेटवर्क में लागू हो जाए, तो ये बचत करोड़ों में पहुंच सकती है।
इसका एक और फायदा भी है जिस पर शायद कम ध्यान गया हो। डीज़ल चालित जनरेटर पर निर्भरता कम होने से ट्रेन के पहियों पर पड़ने वाला घर्षण (friction) भी कम होता है, जिससे ट्रेनों की ओवरऑल परिचालन क्षमता में भी सुधार आने की उम्मीद है।
ये कदम अकेला नहीं है — भारतीय रेलवे पहले से ही अपने नेटवर्क में कई जगहों पर सोलर एनर्जी को बढ़ावा दे रही है। उत्तर रेलवे ने हाल ही में एक साल में अपनी सौर ऊर्जा क्षमता तीन गुना बढ़ाई है, और ‘हेड ऑन जेनरेशन’ (HOG) तकनीक के साथ 60 जोड़ी ट्रेनों में सोलर आधारित सिस्टम का सफल परीक्षण भी किया जा चुका है। यानी दादरी एक्सप्रेस वाला ये ट्रायल, रेलवे के बड़े ग्रीन एनर्जी मिशन का ही एक हिस्सा है, जिसका लक्ष्य 2030 तक नेट-ज़ीरो कार्बन एमिशन हासिल करना है।