Bombay HC Denies Maintenance to Woman Earning More Than Husband
मुंबई हाई कोर्ट से एक ऐसा फैसला सामने आया है जो मेंटेनेंस यानी गुज़ारा-भत्ता से जुड़े मामलों में एक अहम मिसाल बन सकता है। कोर्ट ने अमेरिका में रहने वाली एक महिला की उस अर्ज़ी को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने पूर्व पति से हर महीने 1 लाख रुपये अंतरिम मेंटेनेंस की मांग की थी।
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की बेंच ने साफ कहा कि जब पत्नी अपने पति से कहीं ज़्यादा कमा रही हो, तो सिर्फ विदेश में रहने की वजह से जीवन-यापन का खर्च ज़्यादा होने के आधार पर मेंटेनेंस की मांग नहीं की जा सकती। फैमिली कोर्ट ने पहले ही महिला की मेंटेनेंस वाली अर्ज़ी खारिज कर दी थी, और सिर्फ पति को मुकदमे के खर्च के लिए 25,000 रुपये देने का आदेश दिया था। इसी फैसले को महिला ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अब बात करते हैं दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति की, जो इस पूरे फैसले की जड़ में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक महिला एक टेक्निकल बैकग्राउंड से है, जबकि पति नॉन-टेक्निकल फील्ड से है और सिर्फ एक बेसिक SAP कोर्स करके IT सेक्टर में काम कर रहा है। कोर्ट ने अपने ऑर्डर में ये भी नोट किया कि बढ़ती कॉम्पिटीशन और AI की वजह से आ रहे ऑटोमेशन के चलते, पति हमेशा अपनी नौकरी जाने के डर में जी रहा है।
कोर्ट ने ये भी देखा कि छोटे बेटे की ज़िम्मेदारी महिला पर है, जबकि बड़े बेटे की ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई का खर्च पति उठा रहा है। इसके अलावा पति पर अपने बुज़ुर्ग माता-पिता और तलाक के बाद की गई दूसरी शादी से जुड़ी पत्नी की ज़िम्मेदारी भी है।
महिला की तरफ से दलील दी गई थी कि वो अकेले ही छोटे बेटे का पूरा खर्च उठा रही है, और अमेरिका में रहने का खर्च इतना ज़्यादा है कि उसके पास कोई सरप्लस इनकम नहीं बचती। लेकिन बेंच ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा — “उसका सिर्फ यही बहाना है कि वो विदेश में रहने के भारी खर्च की वजह से आर्थिक तंगी में जी रही है।” कोर्ट ने माना कि सिर्फ ये तर्क मेंटेनेंस की मांग को जायज़ नहीं ठहरा सकता, जब आय का आंकड़ा साफ तौर पर पति के मुकाबले ज़्यादा हो।
ये फैसला भारत में मेंटेनेंस से जुड़े कानूनी मामलों में एक दिलचस्प पहलू को उजागर करता है — जहां कोर्ट्स अब सिर्फ जेंडर या पारंपरिक ढांचे को नहीं, बल्कि दोनों पक्षों की असल आर्थिक स्थिति और कमाई की क्षमता को भी बराबर तवज्जो दे रहे हैं। इससे पहले भी कई हाई कोर्ट्स ऐसे मामलों में समान रुख अपना चुकी हैं, जहां पत्नी की कमाई पति से ज़्यादा या बराबर होने पर मेंटेनेंस की मांग को खारिज किया गया हो।
फिलहाल के लिए इतना साफ है कि इस मामले में हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है, और महिला को फिलहाल कोई अतिरिक्त अंतरिम राहत नहीं मिली है।