भारतीय रेलवे अब विदेशी टेक्नोलॉजी पर नहीं रहेगी निर्भर, खुद बना रही अपना सिग्नलिंग सिस्टम — जानिए 7000 किलोमीटर के बुलेट ट्रेन नेटवर्क के पीछे की पूरी प्लानिंग और क्यों जापान भी है थोड़ा नाराज़

भारतीय रेलवे अब विदेशी टेक्नोलॉजी पर नहीं रहेगी निर्भर, खुद बना रही अपना सिग्नलिंग सिस्टम — जानिए 7000 किलोमीटर के बुलेट ट्रेन नेटवर्क के पीछे की पूरी प्लानिंग और क्यों जापान भी है थोड़ा नाराज़

भारतीय रेलवे अब विदेशी टेक्नोलॉजी पर नहीं रहेगी निर्भर, खुद बना रही अपना सिग्नलिंग सिस्टम — जानिए 7000 किलोमीटर के बुलेट ट्रेन नेटवर्क के पीछे की पूरी प्लानिंग और क्यों जापान भी है थोड़ा नाराज़

भारतीय रेलवे अब सिर्फ पटरियां बिछाने और तेज़ ट्रेनें चलाने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वो अपनी खुद की सिग्नलिंग टेक्नोलॉजी भी बना रही है। भारत अपना खुद का “Bharat Train Control System” (BTCS) डेवलप कर रहा है, जो आने वाले 7,000 किलोमीटर के हाई-स्पीड रेल नेटवर्क को पावर देगा और विदेशी सिग्नलिंग टेक्नोलॉजी पर निर्भरता कम करेगा। यानी अब बुलेट ट्रेन के लिए बाहर से महंगा सिस्टम खरीदने की मजबूरी धीरे-धीरे खत्म होने वाली है।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने खुद इस पूरे प्लान का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि सरकार विकसित भारत विज़न के तहत 2047 तक 7,000 किलोमीटर के डेडिकेटेड पैसेंजर कॉरिडोर बनाने की योजना बना रही है, जिन पर ट्रेनें अधिकतम 350 किलोमीटर प्रति घंटा और सामान्य रूप से 320 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ेंगी।

अब सवाल आता है कि ये BTCS आखिर है क्या और इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी? दरअसल अभी तक मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट्स यूरोपियन ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ETCS) पर निर्भर हैं, और जून 2025 में इसी सिग्नलिंग सिस्टम के लिए 4,100 करोड़ रुपये का बड़ा कॉन्ट्रैक्ट भी दिया जा चुका है। लेकिन आगे चलकर पूरे 7,000 किलोमीटर के नेटवर्क के लिए हर बार विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहना न तो किफायती है, न ही रणनीतिक रूप से समझदारी। इसीलिए भारत अपना open-source, indigenous सिस्टम तैयार कर रहा है, ताकि आगे चलकर घरेलू कंपनियों को भी बड़ा रोल मिल सके और लागत भी कम हो।

दिलचस्प बात ये है कि इस फैसले से जापान थोड़ा नाराज़ भी नज़र आ रहा है। भारत ने अपने बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के लिए जापान के प्रोप्राइटरी DS-ATC सिस्टम की बजाय ETCS Level-2 सिग्नलिंग स्टैंडर्ड अपनाने का फैसला किया, जो 350 किलोमीटर प्रति घंटा तक की स्पीड सपोर्ट करता है और ट्रेनों व कंट्रोल सेंटर के बीच लगातार कम्युनिकेशन बनाए रखता है। जापान के कुछ पूर्व अधिकारियों ने इसे लेकर सोशल मीडिया पर नाराज़गी भी जताई थी।भारतीय रेलवे अब विदेशी टेक्नोलॉजी पर नहीं रहेगी निर्भर, खुद बना रही अपना सिग्नलिंग सिस्टम — जानिए 7000 किलोमीटर के बुलेट ट्रेन नेटवर्क के पीछे की पूरी प्लानिंग और क्यों जापान भी है थोड़ा नाराज़

हालांकि भारतीय अधिकारियों का कहना है कि ये फैसला किसी की अनदेखी नहीं बल्कि व्यावहारिक ज़रूरत है। भारत के पास पहले से ही दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल (नमो भारत) पर ETCS Level 2 के साथ ऑपरेशनल अनुभव मौजूद है, जो एक व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला इंटरनेशनल स्टैंडर्ड है और भविष्य में एक्सपोर्ट के मौके भी खोलता है, जबकि जापान का सिस्टम पूरी तरह उन्हीं की ट्रेनों तक सीमित रहता।

फिलहाल के लिए, जापान से E10 सीरीज़ की शिंकानसेन ट्रेनें मिलने में देरी की वजह से भारत 2027 में अपनी खुद की स्वदेशी B-28 हाई-स्पीड ट्रेन से शुरुआत करने की तैयारी में है, जिसे बेंगलुरु में BEML बना रही है।

कुल मिलाकर, भारतीय रेलवे अब सिर्फ तेज़ ट्रेनें चलाने की रेस में नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी बड़ा कदम उठा रही है। आने वाले सालों में देखना दिलचस्प होगा कि ये स्वदेशी सिस्टम कितना कामयाब साबित होता है।


 

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