बिना पहियों के हवा में तैरकर 600 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ती है ये ट्रेन, जानिए मैग्नेट की ताकत से कैसे होता है ये कमाल, वैज्ञानिकों का दिमाग भी है इसके पीछे
ज़रा सोचिए, एक ट्रेन बिना पटरी छुए, हवा में हल्का सा तैरते हुए 500-600 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से दौड़े। सुनने में साइंस फिक्शन जैसा लगता है ना? लेकिन ये असलियत है, और इसका नाम है मैगलेव ट्रेन। इसका पूरा राज़ छुपा है मैग्नेट यानी चुंबक की ताकत में।
दरअसल पारंपरिक पहियों, एक्सल और स्टील ट्रैक पर निर्भर रहने की बजाय, मैगलेव ट्रेनें कंप्यूटर-कंट्रोल्ड मैग्नेटिक फील्ड्स का इस्तेमाल करके ट्रेन को गाइडवे के ऊपर हवा में उठाकर आगे बढ़ाती हैं। यानी ट्रेन और ट्रैक के बीच सीधा कोई फिजिकल कॉन्टैक्ट होता ही नहीं। यही वजह है कि इसमें रगड़ यानी friction लगभग खत्म हो जाती है, और ट्रेन इतनी तेज़ रफ्तार पकड़ पाती है।
अब सवाल है कि ये मैग्नेट काम कैसे करते हैं? इसके पीछे मैग्नेटिज़्म का बेसिक नियम है — एक जैसे पोल (नॉर्थ-नॉर्थ या साउथ-साउथ) एक-दूसरे को धक्का देते हैं, जबकि उल्टे पोल (नॉर्थ-साउथ) एक-दूसरे को खींचते हैं। मैगलेव सिस्टम इन्हीं दोनों तरह की मैग्नेटिक फोर्स का इस्तेमाल ट्रेन को ऊपर उठाने और आगे बढ़ाने, दोनों के लिए करता है।
दुनिया में इसके मुख्य रूप से दो तरीके इस्तेमाल होते हैं। पहला है Electromagnetic Suspension यानी EMS, जो शंघाई की मैगलेव ट्रेन में इस्तेमाल होता है। इसमें ट्रेन के C-शेप वाले आर्म्स गाइडवे के स्टील अंडरसाइड की तरफ ऊपर की ओर आकर्षण बल लगाते हैं, जिससे ट्रेन ट्रैक से लगभग 10 मिलीमीटर ऊपर तैरती है। दूसरा तरीका है Electrodynamic Suspension यानी EDS, जो जापान की SCMAGLEV में इस्तेमाल होता है। इसमें बेहद ठंडे तापमान पर रखे गए सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट्स, ट्रैक की कॉइल्स में करंट पैदा करते हैं, जिससे रिपल्सिव यानी दूर धकेलने वाला मैग्नेटिक फोर्स बनता है और ट्रेन लगभग 100 मिलीमीटर ऊपर उठ जाती है।
इतना ही नहीं, मैग्नेट की ताकत का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स धरती के गुरुत्वाकर्षण बल से करीब 1039 गुना ज़्यादा शक्तिशाली होता है, जिस वजह से ये आसानी से 150 से 500 टन तक वज़नी ट्रेन के डिब्बों को ज़मीन से ऊपर उठा देता है।
अब बात करते हैं स्पीड की — अब तक की सबसे तेज़ रिकॉर्डेड मैगलेव ट्रेन स्पीड रही है 603 किलोमीटर प्रति घंटा, जो जापान में हासिल की गई थी। और अगर भविष्य में इसे evacuated यानी हवा-रहित टनल में चलाया जाए, तो इसकी स्पीड 6,400 किलोमीटर प्रति घंटा तक भी पहुंच सकती है, हालांकि इतनी रफ्तार पर ज़्यादातर एनर्जी हवा के घर्षण से लड़ने में खर्च होती है, जैसा किसी भी हाई-स्पीड ट्रेन के साथ होता है।
मज़े की बात ये कि मैगलेव टेक्नोलॉजी सिर्फ ट्रेनों तक सीमित नहीं है। आधुनिक मिलिट्री एयरक्राफ्ट कैरियर्स पर मैगलेव प्रोपल्शन से मिलते-जुलते लीनियर इंडक्शन मोटर्स का इस्तेमाल करके भारी फाइटर जेट्स को छोटे रनवे से भी लॉन्च किया जाता है।
कुल मिलाकर, मैगलेव ट्रेन सिर्फ एक तेज़ रफ्तार वाली ट्रेन नहीं, बल्कि फिज़िक्स और इंजीनियरिंग के कमाल का एक बेहतरीन उदाहरण है — जहां चुंबक की ताकत ही सारा खेल बदल देती है।